Wednesday, June 24, 2026 10:06:27 PM

सूत संगम में सजी भारत की हथकरघा विरासत
'सूत संगम' में दिख रही है भारत की हथकरघा विरासत

दिल्ली के हैंडलूम हाट में 24 जून से 1 जुलाई तक आयोजित ‘सूत संगम’ एक्सपो में देशभर के 70 से अधिक बुनकर अपनी पारंपरिक हथकरघा कला और हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

सूत संगम में दिख रही है भारत की हथकरघा विरासत
सूत संगम में सजी भारत की हथकरघा विरासत |

नई दिल्ली: विकास आयुक्त (हथकरघा), वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेशनल डिज़ाइन सेंटर एवं इंडिया हैंडलूम के सहयोग से जनपथ स्थित हैंडलूम हाट में स्पेशल हैंडलूम एक्सपो "सूत संगम" का आयोजन किया जा रहा है। यह विशेष प्रदर्शनी 24 जून से 01 जुलाई 2026 तक आयोजित की जा रही है, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों के बुनकर और कारीगर अपनी उत्कृष्ट हथकरघा परंपराओं एवं हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

यह आठ दिवसीय एक्सपो प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे से रात 8:00 बजे तक आम जनता के लिए खुला है। प्रदर्शनी का उद्देश्य भारतीय हथकरघा की समृद्ध विरासत को बढ़ावा देना, बुनकरों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराना तथा उपभोक्ताओं को प्रामाणिक हैंडलूम उत्पादों से जोड़ना है।

देशभर से आए 70 से अधिक बुनकर, स्वयं सहायता समूह एवं सहकारी संस्थाएँ इस एक्सपो में भाग ले रही हैं। आगंतुकों को विभिन्न राज्यों के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों, आकर्षक डिज़ाइनों और हस्तनिर्मित वस्त्रों की विविधता को एक ही छत के नीचे देखने और खरीदने का अवसर मिल रहा है।

प्रदर्शनी में आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों के प्रामाणिक हैंडलूम सिल्क एवं कॉटन साड़ियाँ, सूट-दुपट्टा सेट, शॉल, स्टोल, बेडशीट्स, होम फर्निशिंग्स, कुर्ते, धोती, दरियाँ तथा अन्य हस्तनिर्मित उत्पाद प्रदर्शित किए जा रहे हैं।

"सूत संगम" केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि भारत की विविध हथकरघा परंपराओं, रंगों और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। यह मंच कारीगरों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संवाद स्थापित करते हुए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और 'माय हैंडलूम, माय प्राइड' की भावना को सशक्त बनाने का प्रयास है।

विकास आयुक्त (हथकरघा), वस्त्र मंत्रालय की यह पहल भारतीय हथकरघा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने, बुनकरों की आजीविका को सशक्त बनाने तथा देश की समृद्ध वस्त्र विरासत को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


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