भारतीय नौसेना ने सी किंग ब्रावो को विदाई दी |
भारतीय नौसेना के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय रविवार को समाप्त हो गया। करीब चार दशकों तक देश की समुद्री सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को आधिकारिक तौर पर सेवा से विदा कर दिया गया। इस अवसर पर मुंबई के कोलाबा स्थित पश्चिमी नौसेना कमान बेस आईएनएस शिकरा में अंतिम औपचारिक उड़ान का आयोजन किया गया।
अंतिम उड़ान के साथ खत्म हुआ एक गौरवशाली सफर
रविवार सुबह सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टर ने अपनी आखिरी उड़ान भरी। इस दौरान दो सी किंग चार्ली हेलीकॉप्टर उसकी सुरक्षा में साथ उड़ान भर रहे थे। मिशन पूरा होने के बाद लौटने पर हेलीकॉप्टर को अग्निशमन कर्मियों ने पारंपरिक जल तोपों की सलामी देकर सम्मानित किया।
यह दृश्य नौसेना के अधिकारियों और पूर्व कर्मियों के लिए भावुक कर देने वाला रहा।
1989-90 में नौसेना में शामिल हुए थे हेलीकॉप्टर
सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को भारतीय नौसेना ने 1989 और 1990 के बीच अपने बेड़े में शामिल किया था। इन्हें विशेष रूप से जहाज-रोधी और पनडुब्बी-रोधी युद्ध अभियानों के लिए खरीदा गया था।
अपने चरम दौर में भारतीय नौसेना के पास ऐसे लगभग 20 हेलीकॉप्टर थे। समुद्र में दुश्मन जहाजों और पनडुब्बियों का पता लगाने तथा उन पर कार्रवाई करने की क्षमता के कारण इन्हें "फ्लाइंग फ्रिगेट" यानी "उड़ने वाला युद्धपोत" भी कहा जाता था।
पूर्व नौसेना अधिकारी ने साझा की भावनाएं
सी किंग ब्रावो उड़ाने वाले सेवानिवृत्त कैप्टन संजय कार्वे ने कहा कि जब यह हेलीकॉप्टर नौसेना में शामिल किया गया था, तब यह विमानन तकनीक के लिहाज से बेहद उन्नत माना जाता था।
उन्होंने बताया कि अपने नौसैनिक करियर का बड़ा हिस्सा उन्होंने इसी हेलीकॉप्टर के साथ बिताया और हारपून स्क्वाड्रन के साथ उनका जुड़ाव बेहद खास रहा।
कार्वे ने कहा कि यह उनके लिए भावनात्मक पल है। उन्होंने बताया कि सी किंग ब्रावो उनकी नौसेना और विमानन यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहा है। इसके साथ उन्होंने कई यादगार पल बिताए, सफलताएं देखीं और कुछ साथियों को खोने का दुख भी झेला।
उनके अनुसार, इस विदाई के मौके पर उनकी आंखों में खुशी और दुख दोनों के आंसू थे, खुशी इस बात की कि वह इस गौरवशाली परिवार का हिस्सा रहे और दुख इस बात का कि अब यह हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना के रंगों में उड़ता दिखाई नहीं देगा।
1971 से शुरू हुई थी सी किंग हेलीकॉप्टरों की कहानी
भारतीय नौसेना ने पहली बार अप्रैल 1971 में सी किंग मार्क हेलीकॉप्टरों को अपने बेड़े में शामिल किया था। इनका उद्देश्य पाकिस्तानी पनडुब्बियों के खिलाफ पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करना था।
सी किंग 42 अल्फा वेरिएंट को नीलगिरी श्रेणी के फ्रिगेट्स पर तैनात किया गया था। बाद में सी किंग मार्क 42 और 42 अल्फा वेरिएंट को सेवा से हटा दिया गया। इसके बाद ब्रावो वेरिएंट ही इस श्रृंखला का अंतिम सक्रिय हेलीकॉप्टर बचा था।
युद्ध से लेकर बचाव अभियानों तक निभाई अहम भूमिका
कैप्टन कार्वे के अनुसार, सेवानिवृत्ति तक लगभग आठ सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टर सेवा में मौजूद थे।
इन हेलीकॉप्टरों ने वर्षों तक विमानवाहक पोतों, लिएंडर श्रेणी, गोदावरी श्रेणी और दिल्ली श्रेणी के युद्धपोतों से संचालन किया। युद्धक अभियानों के अलावा इन्हें खोज और बचाव (सर्च एंड रेस्क्यू) मिशनों में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।
करीब 36 वर्षों तक भारतीय नौसेना की ताकत बने रहने के बाद अब सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टर इतिहास का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन देश की समुद्री सुरक्षा में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।