Wednesday, June 10, 2026 08:21:37 PM

गॉडजिला अल नीनो 2026 मॉनसून पर बड़ा खतरा
क्या 2026 का ‘गॉडजिला अल-नीनो’ दुनिया के लिए बन सकता है क्लाइमेट बम? ECMWF के नए संकेतों ने बढ़ाई चिंता

2026 में संभावित 'गॉडजिला अल-नीनो' को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। ECMWF के नए मॉडल में रिकॉर्ड गर्मी, कमजोर मॉनसून, सूखा, बाढ़ और वैश्विक जलवायु जोखिमों के संकेत मिले हैं।

क्या 2026 का ‘गॉडजिला अल-नीनो’ दुनिया के लिए बन सकता है क्लाइमेट बम ecmwf के नए संकेतों ने बढ़ाई चिंता
गॉडजिला अल नीनो 2026 मॉनसून पर बड़ा खतरा |

दुनिया एक बार फिर एक बड़े जलवायु बदलाव की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। मौसम वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय मौसम संस्थानों के ताजा आकलनों ने वर्ष 2026 में विकसित हो रहे संभावित सुपर अल-नीनो को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कई विशेषज्ञ इसे "गॉडजिला अल-नीनो" का नाम दे रहे हैं, क्योंकि इसकी संभावित तीव्रता अब तक दर्ज किए गए सबसे शक्तिशाली अल-नीनो घटनाक्रमों को भी पीछे छोड़ सकती है।

हाल ही में यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) द्वारा जारी किए गए मौसम मॉडल अपडेट्स ने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। मॉडल के अनुसार, प्रशांत महासागर में अत्यंत शक्तिशाली सुपर अल-नीनो विकसित होने के संकेत मिल रहे हैं। यदि वर्तमान अनुमान सही साबित होते हैं, तो यह आधुनिक सैटेलाइट युग में दर्ज सबसे तीव्र अल-नीनो घटनाओं में शामिल हो सकता है।

आखिर क्या है ‘गॉडजिला अल-नीनो’?

अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो आमतौर पर हर दो से सात वर्ष के बीच विकसित होता है। यह तब उत्पन्न होता है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर से 2.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, तो इसे "सुपर अल-नीनो" की श्रेणी में रखा जाता है। इंडोनेशिया की IPB यूनिवर्सिटी सहित कई शोध संस्थानों के विश्लेषण बताते हैं कि 2026 में यह वृद्धि 2.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकती है।

ECMWF के नवीनतम मॉडल और अन्य वैश्विक अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026 के बाद के महीनों में प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 3 से 4 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। कुछ क्षेत्रों, विशेष रूप से पेरू और इक्वाडोर के तटीय इलाकों में, तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जाने के संकेत भी मिले हैं। इसी असाधारण संभावित ताकत के कारण इसे अनौपचारिक रूप से "गॉडजिला अल-नीनो" कहा जा रहा है।

अल-नीनो कैसे बदल देता है दुनिया का मौसम?

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलने वाली व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) गर्म समुद्री जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं, जिससे उन क्षेत्रों में वर्षा को बढ़ावा मिलता है।

लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या कई बार अपनी दिशा भी बदल लेती हैं। परिणामस्वरूप गर्म पानी दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट, विशेष रूप से पेरू और इक्वाडोर के पास जमा होने लगता है। समुद्र की सतह का यह असामान्य तापमान वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है और पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव ला सकता है।

इतिहास क्यों बढ़ा रहा है चिंता?

अल-नीनो के प्रभावों का अंदाजा इसके पिछले रिकॉर्ड से लगाया जा सकता है।

1982-83 का अल-नीनो

इस दौरान प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से लगभग 2.1 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया था। इसके परिणामस्वरूप दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसम घटनाएं देखने को मिली थीं।

1997-98 का सुपर अल-नीनो

इसे अब तक के सबसे विनाशकारी अल-नीनो घटनाक्रमों में गिना जाता है। इस अवधि में वैश्विक स्तर पर 23,000 से अधिक लोगों की मौत हुई और 45 अरब डॉलर से ज्यादा का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया। कैलिफोर्निया में गंभीर बाढ़ आई, जबकि इंडोनेशिया और ब्राजील में बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगी। अफ्रीका और भारत के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनीं।

2015-16 का सुपर अल-नीनो

यह आधुनिक दौर का सबसे शक्तिशाली अल-नीनो माना जाता है। इसने वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया और दुनिया ने उस समय अपने सबसे गर्म वर्षों में से एक का अनुभव किया। भारत में भी लगातार कमजोर मॉनसून और सूखे जैसी स्थितियां देखने को मिली थीं।

इसी इतिहास को देखते हुए वैज्ञानिक 2026 के संभावित सुपर अल-नीनो को लेकर सतर्क हैं।

भारत के मॉनसून पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता दक्षिण-पश्चिम मॉनसून है, क्योंकि देश की कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं।

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो मजबूत अल-नीनो घटनाओं और कमजोर भारतीय मॉनसून के बीच गहरा संबंध पाया गया है। प्रशांत महासागर के अत्यधिक गर्म होने से मॉनसून की हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे जून से सितंबर के बीच होने वाली वर्षा प्रभावित हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026 का सुपर अल-नीनो पूरी ताकत से विकसित होता है, तो उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कई हिस्सों में वर्षा की कमी और सूखे जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, जल भंडारण और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।

हालांकि मौसम वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर अल-नीनो का प्रभाव समान नहीं होता। हिंद महासागर में सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल (Positive IOD) जैसी परिस्थितियां कई बार अल-नीनो के नकारात्मक प्रभावों को आंशिक रूप से संतुलित कर सकती हैं।

दुनिया के अन्य हिस्सों पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों के अनुसार, संभावित गॉडजिला अल-नीनो का प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।

  • ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े हिस्सों में गंभीर सूखे की आशंका बढ़ सकती है।
  • जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
  • पेरू और इक्वाडोर सहित दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
  • समुद्र के गर्म पानी से उष्णकटिबंधीय तूफानों और चक्रवातों को अतिरिक्त ऊर्जा मिल सकती है, जिससे उनकी तीव्रता और संख्या बढ़ने की संभावना रहेगी।
  • वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

अगर अल-नीनो शुरू हो चुका है तो कई जगह बारिश क्यों हो रही है?

यह सवाल कई लोगों के मन में है कि यदि अल-नीनो सक्रिय हो रहा है, तो कुछ क्षेत्रों में सामान्य या भारी बारिश क्यों देखने को मिल रही है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अल-नीनो का प्रभाव तुरंत और एक समान तरीके से दिखाई नहीं देता। स्थानीय मौसम प्रणालियां, समुद्री हवाएं, क्षेत्रीय दबाव तंत्र और अन्य वैश्विक जलवायु घटनाएं इसके प्रभाव को जटिल बना देती हैं।

यही कारण है कि अल-नीनो के शुरुआती चरणों में कुछ क्षेत्रों में सामान्य या औसत से अधिक वर्षा भी हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां विकसित होने लगती हैं। यह एक बहुस्तरीय और जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे किसी एक निश्चित पैटर्न से नहीं समझा जा सकता।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकता है खतरा

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संभावित सुपर अल-नीनो ऐसे समय में विकसित हो रहा है जब पृथ्वी पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार गर्म हो रही है।

हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तरों तक पहुंचा है। ऐसे में यदि एक अत्यधिक शक्तिशाली अल-नीनो विकसित होता है, तो यह वैश्विक तापमान को और ऊपर धकेल सकता है। इसके परिणामस्वरूप खाद्य सुरक्षा, जल संकट, ऊर्जा मांग और चरम मौसम घटनाओं से जुड़े जोखिम और बढ़ सकते हैं।

क्या दुनिया तैयार है?

दुनिया भर की मौसम एजेंसियां और सरकारें इस संभावित स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। भारत में भी मॉनसून की निगरानी बढ़ाई गई है और कृषि क्षेत्र के लिए विभिन्न सलाह जारी की जा रही हैं।

हालांकि आधुनिक मौसम पूर्वानुमान तकनीक और बेहतर आपदा प्रबंधन प्रणालियां पहले की तुलना में अधिक सक्षम हैं, लेकिन यदि 2026 का संभावित "गॉडजिला अल-नीनो" अपने अनुमानित स्तर तक पहुंचता है, तो यह वैश्विक जलवायु व्यवस्था के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।

फिलहाल वैज्ञानिकों का कहना है कि घबराने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने और लगातार बदल रहे मौसम संकेतों पर नजर रखने की जरूरत है। आने वाले महीनों में प्राप्त होने वाले नए डेटा और मॉडल अपडेट यह तय करेंगे कि यह संभावित सुपर अल-नीनो वास्तव में इतिहास रचेगा या उसकी तीव्रता अनुमान से कम रहेगी।


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