Sunday, May 24, 2026 04:18:13 AM

बिहार चुनाव और अपराधी उम्मीदवार
साफ-सुथरी राजनीति के दावों पर भारी दागी उम्मीदवार — बिहार चुनाव में हर तीसरा प्रत्याशी अपराधी पृष्ठभूमि वाला

नई रिपोर्ट के अनुसार, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में हर तीसरे उम्मीदवार पर आपराधिक केस दर्ज है, जिससे राजनीति और अपराध के बीच संबंधों की गहराई उजागर होती है।

साफ-सुथरी राजनीति के दावों पर भारी दागी उम्मीदवार — बिहार चुनाव में हर तीसरा प्रत्याशी अपराधी पृष्ठभूमि वाला
बिहार चुनाव में वायरल होती एक तस्वीर | पाठकराज
पाठकराज

नोएडा (नेशनल डेस्क) - बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जब हर राजनीतिक दल जनता के सामने “साफ छवि” और “बेहतर कानून-व्यवस्था” वाली सरकार का वादा कर रहा है, ठीक उसी समय एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और बिहार इलेक्शन वॉच की नई रिपोर्ट ने इन दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट बताती है कि चुनाव मैदान में उतरे हर तीसरे उम्मीदवार पर आपराधिक केस दर्ज है। यह बिहार की राजनीति में अपराध और शक्ति के पुराने गठजोड़ को एक बार फिर उजागर करता है।

 

रिपोर्ट के मुख्य तथ्य

कुल उम्मीदवार: 1,314

क्रिमिनल केस वाले उम्मीदवार: 423 (32%)

गंभीर आपराधिक केस: 354 (27%)

हत्या के आरोपी: 33

हत्या की कोशिश: 86

महिला अपराध: 42

दुष्कर्म के आरोपी: 2

ये आंकड़े उम्मीदवारों के स्वयं दिए गए एफिडेविट पर आधारित हैं — यानी दाग उन्होंने खुद कबूल किए हैं।


 

कौन कितने दागी — पार्टीवार स्थिति

पार्टी कुल उम्मीदवार आपराधिक केस वाले प्रतिशत
CPI 3 3 100%
CPI(ML) 14 13 93%
राजद 70 53 76%
भाजपा 48 31 65%
कांग्रेस 23 15 65%
लोजपा (रामविलास) 13 7 54%
जनसुराज पार्टी 114 50 44%
जदयू 57 22 39%
आप 44 12 27%
बसपा 89 18 20%

 


 

40 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति

रिपोर्ट का दूसरा चौंकाने वाला पहलू आर्थिक संपन्नता का है। 519 उम्मीदवार करोड़पति हैं, यानी कुल का 40%। 519 उम्मीदवार केवल 5वीं से 12वीं तक पढ़े हैं, जबकि 651 उम्मीदवार ग्रेजुएट या उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। यह दिखाता है कि बिहार में राजनीति अब पैसे और ताकत का खेल बन चुकी है, जहां गरीब या मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है।


 

विश्लेषण: अपराध और राजनीति का पुराना रिश्ता

 साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाले दलों में भी अपराधियों को टिकट देने की होड़ लगी है। राजद इस सूची में सबसे ऊपर है। वहीं, जदयू का प्रतिशत सबसे कम (39%) है, लेकिन “क्लीन इमेज” के वादे पर सवाल फिर भी कायम हैं। बिहार में राजनीति और अपराध का गठजोड़ नया नहीं है, लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और बिहार इलेक्शन वॉच की यह रिपोर्ट यह दिखाती है कि समय के साथ यह और मजबूत हुआ है। राजनीतिक दलों को पता है कि अपराधियों का स्थानीय प्रभाव, संसाधन और “जीतने की क्षमता” उन्हें टिकट दिलाने में मदद करती है। यही वजह है कि दागियों को टिकट देना अब “राजनीतिक रणनीति” बन चुका है, न कि अपवाद। 


 

जनता का सवाल: बदलाव कब?

बिहार के मतदाता अब शिक्षित और जागरूक हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के जमाने में ये डेटा खुलकर सामने आ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब हर पार्टी अपराधियों को टिकट दे रही है — तो जनता के पास “क्लीन चॉइस” बचेगी कैसे?


 

चुनावी सफाई का वादा, सियासी सच्चाई से दूर

बिहार में 2025 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। रिपोर्ट यह साबित करती है कि चाहे वामदल हों, राजद या भाजपा-कांग्रेस — सबकी थाली में दाग है। राजनीति में अपराधियों की मौजूदगी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। अब देखना यह है कि जनता इस बार “दागदार उम्मीदों” के बीच कितना साफ निर्णय देती है।


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