मुजफ्फरनगर दंगा 13वीं बरसी पोस्टर विवाद |
मुजफ्फरनगर दंगे की 13वीं बरसी पर उत्तर प्रदेश के कई शहरों में लगाए गए पोस्टरों को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई जगहों पर पोस्टर लगाए गए हैं। इन पर लिखा है- ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे, मुजफ्फरनगर दंगा।’
7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर में शुरू हुई हिंसा में 60 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि 50 हजार से अधिक लोग प्रभावित होकर अपने घरों से विस्थापित हुए थे। हालात पर काबू पाने के लिए सेना की मदद भी लेनी पड़ी थी।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए पोस्टर
दंगे की बरसी पर लगाए गए इन पोस्टरों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। हालांकि, कई जगहों पर प्रशासन ने पोस्टर हटवा दिए। इसके बाद पोस्टर लगाने वालों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।
उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। विपक्ष ने सरकार पर दंगे रोकने में नाकाम रहने और कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। सपा सरकार पर दंगाइयों को संरक्षण देने के आरोप भी लगाए गए थे। वहीं, दंगों के दौरान अखिलेश यादव के सैफई महोत्सव में शामिल होने को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ था।
पोस्टरों को लेकर सपा ने लगाए आरोप
पोस्टर सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया कि इन्हें लगाने के पीछे सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों की भूमिका हो सकती है। हालांकि, पोस्टर किसने लगाए और उनका मकसद क्या था, इसे लेकर प्रशासन की ओर से अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस अलग-अलग जिलों में लगे पोस्टरों की जानकारी जुटा रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार सीसीटीवी फुटेज और सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो की भी जांच की जा रही है।
2013 में कैसे शुरू हुआ था तनाव?
मुजफ्फरनगर में 2013 की हिंसा से पहले 27 अगस्त को कवाल गांव में एक घटना हुई थी। शाहनवाज की हत्या के बाद सचिन और गौरव नाम के दो युवकों की हत्या से इलाके में तनाव बढ़ गया था।
इसके बाद कई जगह पंचायतें हुईं और राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर बयानबाजी तेज हो गई। खालापार और नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त को हुई पंचायतों के बाद तनाव और बढ़ गया था।
7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत के बाद बड़ी संख्या में लोग अपने गांवों की ओर लौट रहे थे। इसी दौरान बसी कलां समेत कई इलाकों में विवाद, पथराव और हिंसा की घटनाएं हुईं। इसके बाद मुजफ्फरनगर के कई थाना क्षेत्रों में हिंसा फैल गई।
मीरापुर क्षेत्र के मुझेड़ा, पुरबालियान और जौली गंगनहर के अलावा भौराकलां, शाहपुर, तितावी, बुढ़ाना, फुगाना और भोपा जैसे इलाकों में भी हालात बिगड़ गए थे।
हजारों लोगों को छोड़ना पड़ा था घर
हिंसा के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घर छोड़ दिए और राहत शिविरों में शरण ली। सरकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार दंगों में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी और हजारों परिवार प्रभावित हुए थे।
तत्कालीन सरकार की ओर से कुछ प्रभावित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गई थी। कई लोगों को अलग-अलग विभागों में रोजगार मिला।
13 साल बाद फिर राजनीतिक चर्चा
मुजफ्फरनगर दंगे को 13 साल बीत चुके हैं, लेकिन इस घटना की यादें आज भी प्रभावित परिवारों के लिए दर्दनाक हैं। समय के साथ सामान्य जीवन वापस लौटा, लेकिन हिंसा में अपनों को खोने वाले परिवारों का दर्द पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
बरसी पर लगाए गए पोस्टरों ने एक बार फिर 2013 की घटनाओं को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। प्रदेश में चुनावी गतिविधियां भी तेज हैं, ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और बढ़ सकती है।
फिलहाल पुलिस पोस्टर लगाने वालों की पहचान और उनके पीछे की वजह का पता लगाने में जुटी है। प्रशासन की जांच पूरी होने के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि इन पोस्टरों के पीछे किसकी भूमिका थी।