Saturday, October 10, 2026 10:32:11 PM

सपा नीली ड्रेस कोड 2027 चुनाव
लाल टोपी से नीली ड्रेस तक, 2027 से पहले सपा का नया दांव

2027 चुनाव से पहले सपा ने छात्र सभा के लिए नीली ड्रेस तय की है। नीली पैंट-शर्ट या जींस-टीशर्ट पर साइकिल और छात्र सभा का लोगो होगा। इसे दलित वोटरों को साधने की रणनीति माना जा रहा है।

लाल टोपी से नीली ड्रेस तक 2027 से पहले सपा का नया दांव
सपा नीली ड्रेस कोड 2027 चुनाव |

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। इसी बीच मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी छात्र इकाई को लेकर बड़ा बदलाव किया है।

अब तक सपा की पहचान लाल टोपी और लाल-हरे गमछे से होती थी, लेकिन अब समाजवादी छात्र सभा के कार्यकर्ताओं के लिए नीले रंग की ड्रेस तय करने की तैयारी है।

नई ड्रेस में कार्यकर्ता नीली पैंट के साथ नीली शर्ट या नीली जींस और नीली टी-शर्ट में नजर आएंगे। इन खास तौर पर तैयार की गई शर्ट और टी-शर्ट पर समाजवादी छात्र सभा का लोगो और पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल भी छपा होगा।

सपा की ओर से यह बदलाव बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से छात्र सभा को जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

सूत्रों और पार्टी कार्यक्रमों के मुताबिक, सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मंगलवार को लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय में इस नई ड्रेस को आधिकारिक तौर पर लॉन्च करेंगे। कार्यक्रम के लिए प्रदेशभर से सैकड़ों कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है। इसके अलावा अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के वर्तमान और पूर्व छात्र संघ अध्यक्षों के साथ प्रमुख छात्र नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है।

नीले रंग के पीछे क्या है सियासी रणनीति?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से दलित आंदोलनों और बहुजन समाज पार्टी (BSP) से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में सपा का लाल रंग की पहचान से आगे बढ़कर नीले रंग को छात्र संगठन की नई पहचान बनाना राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है।

हाल ही में अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव भी नीले गमछे में नजर आए थे। अब छात्र सभा के लिए नीली ड्रेस तय करने को सपा की PDA फॉर्मूले को मजबूत करने और दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

यानी 2027 के चुनाव से पहले सपा सिर्फ अपनी छात्र इकाई का ड्रेस कोड नहीं बदल रही, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक समीकरण को भी मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।


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