एमपी राज्यसभा चुनाव विवाद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई |
मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार की जीत भी लगभग तय मानी जा रही थी।
हालांकि, कांग्रेस ने नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट दोनों का दरवाजा खटखटाया है। अब इस मामले पर सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।
कांग्रेस ने चुनाव आयोग और बीजेपी पर लगाए आरोप
बीजेपी उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचित होने के बाद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की मौजूदगी में पार्टी नेताओं की बैठक हुई। इस बैठक में कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग और बीजेपी दोनों पर सवाल उठाए।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि "बीजेपी और चुनाव आयोग की जुगलबंदी ने सीट चोरी की है।"
कांग्रेस का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पर्याप्त कानूनी आधार के बिना और राजनीतिक कारणों से रद्द किया गया। पार्टी ने रिटर्निंग अधिकारी के फैसले को मनमाना और पक्षपातपूर्ण बताया है।
बीजेपी ने फैसले को बताया नियमों के अनुरूप
वहीं बीजेपी का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ जमा किए गए हलफनामे में आवश्यक जानकारी नहीं दी थी। इसी आधार पर उनका नामांकन रद्द किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नामांकन गलत कानूनी आधार पर और पर्याप्त विचार किए बिना खारिज किया गया।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुक्रवार को करने पर सहमति जताई। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव याचिका दाखिल करना सामान्य कानूनी उपाय होता है।
कांग्रेस ने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी क्योंकि गुरुवार को नामांकन वापसी की अंतिम समय सीमा थी। लेकिन सुनवाई शुक्रवार तक टल गई और इस बीच नामांकन वापसी की अवधि समाप्त होने के बाद बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए।
चुनाव आयोग पहुंची कांग्रेस
9 जून की रात नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट और भूपेश बघेल नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचे।
कांग्रेस नेताओं का कहना था कि वे आयोग के सामने अपना पक्ष रखना चाहते हैं। कुछ समय तक नेताओं को आयोग के कार्यालय में प्रवेश नहीं मिला, जिसके बाद वे बाहर धरने पर बैठ गए।
केसी वेणुगोपाल ने कहा था, "यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर संकट का सवाल है।"
बाद में कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपते हुए मामले में हस्तक्षेप की मांग की। कांग्रेस का आरोप है कि 10 जून की सुबह शिकायत करने के बावजूद चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक कोई फैसला नहीं लिया।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें
मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह ने कहा कि नामांकन वापसी की समय सीमा समाप्त होने और उम्मीदवारों के निर्वाचित घोषित हो जाने के बाद मामला पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इससे सुप्रीम कोर्ट के अधिकार समाप्त नहीं होते। यदि अदालत को नामांकन रद्द करने की प्रक्रिया में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि दिखाई देती है तो वह उचित आदेश दे सकती है।
यदि सुप्रीम कोर्ट रिटर्निंग अधिकारी के फैसले को सही ठहराता है या हस्तक्षेप से इनकार करता है, तो बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों का निर्वाचन बरकरार रहेगा।
नामांकन रद्द होने पर उठे सवाल
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद इस फैसले को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया पर लिखा कि चुनाव आयोग कांग्रेस की पुनर्विचार की मांग पर चुप्पी साधे हुए है, जबकि उपलब्ध तथ्यों से पहली नजर में ऐसा नहीं लगता कि नामांकन खारिज किया जाना चाहिए था।
वहीं असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि चुनाव आयोग पहले कह रहा था कि उम्मीदवार के खिलाफ एफआईआर होने की जानकारी देना अनिवार्य है, जबकि बाद में कहा गया कि कोई एफआईआर थी ही नहीं।
अभिषेक मनु सिंघवी ने भी कहा कि यह एक निजी शिकायत का मामला था। उनके अनुसार, मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक एफआईआर दर्ज नहीं थी, बल्कि अदालत में दायर एक निजी शिकायत में उनका नाम शामिल था।
द हिन्दू के संपादकीय में भी उठे सवाल
अंग्रेजी अखबार द हिन्दू ने 12 जून को प्रकाशित अपने संपादकीय में इस मामले को संस्थागत निष्पक्षता और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा बताया।
संपादकीय में कहा गया कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन इस आधार पर रद्द किया गया कि उन्होंने अपने हलफनामे में हैदराबाद में लंबित एक मामले का उल्लेख नहीं किया था। हालांकि यह शिकायत सीधे उनके खिलाफ नहीं थी।
संपादकीय में यह भी कहा गया कि तेलंगाना पुलिस ने मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक एफआईआर दर्ज नहीं की थी। मामले में केवल अदालत द्वारा नोटिस जारी किया गया था। ऐसे में रिटर्निंग अधिकारी द्वारा इसे नामांकन रद्द करने का आधार बनाना कई सवाल खड़े करता है।
संपादकीय के अनुसार, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत केवल उन्हीं मामलों की जानकारी देना अनिवार्य होता है, जिनमें दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो और जिन मामलों में अदालत आरोप तय कर चुकी हो।
फिलहाल इस पूरे विवाद में अब सबसे अहम सवाल यही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस स्तर पर हस्तक्षेप करेगा या कांग्रेस को चुनाव याचिका सहित अन्य कानूनी विकल्पों का सहारा लेना होगा।