Wednesday, July 22, 2026 12:09:06 AM

यूपी में 2027 से पहले एक्शन मोड में ओवैसी
यूपी में 2027 चुनाव से पहले सक्रिय हुई AIMIM, क्या ओवैसी बदल पाएंगे राजनीतिक समीकरण?

2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एआईएमआईएम ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। बहराइच के मटेरा से ओवैसी अभियान शुरू करेंगे। पार्टी 200 सीटों पर चुनाव लड़ने और नए राजनीतिक समीकरण बनाने की तैयारी में है।

यूपी में 2027 चुनाव से पहले सक्रिय हुई aimim क्या ओवैसी बदल पाएंगे राजनीतिक समीकरण
यूपी में 2027 से पहले एक्शन मोड में ओवैसी |

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। 14 जून को बहराइच के मटेरा में होने वाली ओवैसी की जनसभा को पार्टी के नए चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि क्या AIMIM इस बार उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ा प्रभाव छोड़ पाएगी या फिर पिछली बार की तरह उसका असर सीमित ही रहेगा।

मटेरा से अभियान शुरू करने के पीछे क्या है रणनीति?

बहराइच की मटेरा विधानसभा सीट को चुनना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम, यादव, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति मतदाताओं की बड़ी संख्या है। यह सीट लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ रही है।

वर्ष 2012 से यहां लगातार समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है। पहले यासर शाह और बाद में उनकी पत्नी मारिया शाह ने इस सीट पर जीत दर्ज की।

AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का दावा है कि पार्टी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए व्यापक तैयारी कर रही है। उनका कहना है कि यदि पार्टी अकेले चुनाव लड़ती है तो वह लगभग 200 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है।

बीएसपी के साथ गठबंधन की संभावना

शौकत अली ने कहा है कि यदि कोई स्वाभाविक राजनीतिक गठबंधन बन सकता है तो वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ हो सकता है। उनका मानना है कि मुस्लिम और दलित वोटों का संयुक्त आधार समाजवादी पार्टी और बीजेपी दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।

मटेरा की रैली के दौरान ओवैसी का सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर जाना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे मुस्लिम समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

क्या सपा का मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित होगा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि AIMIM की बढ़ती सक्रियता का समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक पर कितना असर पड़ेगा।

2012 के बाद से मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। 2022 विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के खिलाफ रणनीतिक मतदान के कारण मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के पक्ष में गया था।

बहराइच के सपा नेता यासर शाह का कहना है कि मुस्लिम मतदाता अब पहले से अधिक राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। उनके अनुसार, मुस्लिम समाज समझता है कि जहां-जहां AIMIM मजबूत हुई है, वहां विपक्षी वोटों का विभाजन हुआ है, जिसका फायदा बीजेपी को मिला है। इसलिए उत्तर प्रदेश में AIMIM के लिए मजबूत राजनीतिक आधार तैयार करना आसान नहीं होगा।

वहीं AIMIM का कहना है कि दशकों तक मुस्लिम वोट लेने वाली पार्टियां समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए अपेक्षित काम नहीं कर सकीं। पार्टी का दावा है कि मटेरा जैसे कई क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और वह इसी मुद्दे को राजनीतिक समर्थन में बदलने का प्रयास कर रही है।

बिहार और महाराष्ट्र में प्रदर्शन से बढ़ा भरोसा

AIMIM की नई सक्रियता के पीछे बिहार और महाराष्ट्र में मिली हालिया चुनावी सफलताओं को भी एक कारण माना जा रहा है।

बिहार के सीमांचल क्षेत्र में पार्टी ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखी है। वहीं महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में भी पार्टी को उल्लेखनीय सफलता मिली है। इन नतीजों से AIMIM को उम्मीद है कि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों के विकल्प के रूप में उभर सकती है।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक संदीप कुमार वर्मा इस दावे से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि बिहार और महाराष्ट्र की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां उत्तर प्रदेश से अलग हैं। उनके अनुसार, यूपी में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान मतदाता अक्सर जीतने की संभावना को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं, जिससे छोटी पार्टियों के लिए जगह बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

यूपी में AIMIM का चुनावी रिकॉर्ड

उत्तर प्रदेश में AIMIM का विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन अब तक बहुत प्रभावशाली नहीं रहा है।

  • 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।
  • इनमें से 37 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।
  • 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लगभग 100 सीटों पर चुनाव लड़ा।
  • कुल वोट शेयर केवल 0.43 प्रतिशत रहा।

हालांकि स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है।

  • 2017 नगर निकाय चुनाव में AIMIM ने 78 उम्मीदवार उतारे और 29 सीटों पर जीत हासिल की।
  • फिरोजाबाद और आजमगढ़ जैसे जिलों में पार्टी को उल्लेखनीय सफलता मिली।
  • 2023 निकाय चुनाव में पार्टी ने पांच नगर पालिका परिषद सीटें जीतीं।
  • इसके अलावा 75 पार्षदों को भी जीत दिलाने में सफल रही।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि स्थानीय स्तर पर पार्टी का संगठन मौजूद है, लेकिन विधानसभा चुनावों में वह अब तक उस समर्थन को वोटों में बदलने में सफल नहीं हो पाई है।

क्या बन सकता है नया राजनीतिक समीकरण?

राजनीतिक चर्चाओं में AIMIM और बसपा के संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा हो रही है।

यदि बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक और AIMIM का मुस्लिम वोट आधार किसी स्तर पर एकजुट होता है, तो कई सीटों पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती चुनावी गठबंधनों को लेकर हमेशा सतर्क रही हैं।

2019 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन का अनुभव भी बसपा के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं ला सका था। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि बसपा अपने घटते जनाधार को देखते हुए नए विकल्प तलाशती है तो AIMIM के साथ सीमित स्तर पर सहयोग की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ संभावित तालमेल की चर्चाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि फिलहाल किसी औपचारिक बातचीत या गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है।

सपा के गढ़ में भी बढ़ा रही है मौजूदगी

AIMIM की रणनीति केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। पार्टी समाजवादी पार्टी के पारंपरिक प्रभाव वाले इलाकों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है।

इटावा, जिसे सपा का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, वहां AIMIM ने ई-रिक्शा अभियान के जरिए चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने इटावा सदर, भरथना और जसवंतनगर सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा भी की है।

AIMIM नेताओं ने सपा कार्यकर्ताओं पर प्रचार में बाधा डालने के आरोप लगाए हैं, जबकि समाजवादी पार्टी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है।

क्या वोट कटेंगे या बनेगा नया विकल्प?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में AIMIM पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि उसकी मौजूदगी विपक्षी वोटों का बंटवारा करती है, जिससे बीजेपी को लाभ मिलता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी कई बार यह आरोप लगा चुकी हैं।

वहीं AIMIM का कहना है कि लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल को चुनाव लड़ने का अधिकार है और मतदाताओं को विकल्प देना वोट काटने की राजनीति नहीं है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि AIMIM कुछ सीटों पर 3 से 5 प्रतिशत वोट भी हासिल कर लेती है, तो कई करीबी मुकाबलों में उसका असर दिखाई दे सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

ऐसे में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में AIMIM की बढ़ती सक्रियता आने वाले समय में राज्य की राजनीति को किस हद तक प्रभावित करेगी, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।


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