निठारी कांड सुरेंद्र कोली मौत |
बहुचर्चित निठारी कांड एक बार फिर चर्चा में है। इस मामले के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की शुक्रवार को हरिद्वार में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक वह फांसी पर लटका मिला और प्रथम दृष्टया इसे आत्महत्या माना जा रहा है। घटना के बाद पुलिस मामले की जांच कर रही है।
सुरेंद्र कोली का नाम 2006 के निठारी कांड से जुड़ा था। वह नोएडा में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर पर घरेलू सहायक के रूप में काम करता था। 29 दिसंबर 2006 को निठारी गांव में पंढेर की कोठी के पीछे नाले से बच्चों और महिलाओं के कंकाल मिलने के बाद इस मामले का खुलासा हुआ था। इसके बाद कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को गिरफ्तार किया गया था। मामले की शुरुआती जांच गौतमबुद्ध नगर पुलिस ने की थी और बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट से मिली थी दोषमुक्ति
सुरेंद्र कोली के खिलाफ कई मामले चले। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2023 में निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली और सह-आरोपी मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया था। कोली के खिलाफ बचे अंतिम मामले में भी 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया था। कोर्ट ने उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था, यदि किसी दूसरे मामले में उसकी जरूरत न हो।
इस मामले में पहले सुरेंद्र कोली को एक नाबालिग लड़की के दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसला होने में हुई देरी को देखते हुए उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। इसके बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया चली।
जांच और सबूतों पर उठे सवाल
निठारी मामले की जांच के दौरान पुलिस और सीबीआई की कार्रवाई पर भी सवाल उठते रहे। अभियोजन पक्ष कई मामलों में ऐसे ठोस फोरेंसिक और वैज्ञानिक साक्ष्य अदालत के सामने नहीं रख सका, जिनके आधार पर आरोपों को साबित किया जा सके।
मामले में बरामद कंकालों और अन्य साक्ष्यों की जांच, आरोपी के कथित कबूलनामे और बरामदगी से जुड़े सबूतों को लेकर भी अदालतों में सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले में भी उस मामले की दोषसिद्धि के लिए इस्तेमाल किए गए साक्ष्य की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवालों का उल्लेख किया गया।
कोली के खिलाफ अभियोजन पक्ष यह भी साबित नहीं कर सका कि दोनों आरोपियों की मानव अंगों की कथित तस्करी में संलिप्तता थी। अलग-अलग मामलों में सबूतों की कमी का लाभ आरोपियों को मिला।
ऐसे सामने आया था निठारी कांड
29 दिसंबर 2006 को नोएडा के निठारी गांव में मोनिंदर सिंह पंढेर की कोठी के पीछे नाले से मानव अवशेष मिलने के बाद मामला सामने आया था। जांच में कई बच्चों और महिलाओं के लापता होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।
सुरेंद्र कोली को पंढेर का घरेलू सहायक बताया गया था। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और करीब दस दिन बाद जांच सीबीआई को सौंप दी गई। इसके बाद सीबीआई ने भी कई मामलों में आरोप पत्र दाखिल किए।
कोर्ट में चला लंबा मामला
सीबीआई की विशेष अदालत ने निठारी के एक मामले में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को दोषी ठहराया था और मौत की सजा सुनाई थी। बाद में अलग-अलग मामलों में अदालतों के फैसले बदलते गए। पंढेर को कई मामलों में राहत मिली और कोली भी कई मामलों में बरी होता गया।
20 जुलाई 2014 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कोली की दया याचिका खारिज कर दी थी। 8 सितंबर 2014 को उसकी प्रस्तावित फांसी पर अंतिम समय में रोक लगा दी गई थी। जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसले में हुई देरी के कारण उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।
24 जुलाई 2017 को सीबीआई अदालत ने 20 वर्षीय पिंकी सरकार की हत्या और दुष्कर्म के प्रयास से जुड़े मामले में कोली और पंढेर को दोषी ठहराया था। यह निठारी से जुड़े कई मामलों में से एक था।
परिवारों का सवाल- आखिर असली दोषी कौन?
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट से कोली के दोषमुक्त होने के बाद निठारी कांड के पीड़ित परिवारों ने भी सवाल उठाए थे। निठारी कांड से जुड़ी बच्ची ज्योति के पिता झब्बू लाल और मां सुनीता ने सिस्टम, पुलिस और प्रशासन पर नाराजगी जताई थी।
उनका सवाल था कि अगर जिन लोगों को लंबे समय तक आरोपी माना गया, वे अदालत से बरी हो गए, तो आखिर उनके बच्चों का कातिल कौन था?
झब्बू लाल ने बताया था कि उनकी बेटी मेधावी थी और डॉक्टर बनना चाहती थी। उन्होंने कहा था कि यह घटना उनके लिए एक बुरे सपने की तरह रह गई और उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि जिन लोगों को शुरुआत से ही दोषी माना गया, वे आखिरकार बरी हो गए।
सुरेंद्र कोली की अब हरिद्वार में मौत के बाद निठारी कांड एक बार फिर चर्चा में है। करीब दो दशक पुराने इस मामले में कई मुकदमे चले, कई फैसले आए, लेकिन अदालतों से दोषमुक्ति के बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि आखिर निठारी में हुई उन हत्याओं का असली दोषी कौन था।